पौड़ी गढ़वाल: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर उनकी आजीविका मजबूत करने पर विशेष जोर दे रही है। सरकारी योजनाओं, पशुपालन विभाग और स्वयं सहायता समूहों के सहयोग से पौड़ी विकासखंड के भैंसवाड़ा और पैडुल गांव की महिलाएं मुर्गी पालन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की मिसाल पेश कर रही हैं।
भैंसवाड़ा की महिलाओं ने बनाया सफल मॉडल
ग्राम भैंसवाड़ा की जय मंगला देवी स्वयं सहायता समूह की पांच महिलाओं ने वर्ष 2021 में मुर्गी पालन की शुरुआत की थी। वर्तमान में समूह के पास लगभग 300 लेयर मुर्गियां हैं, जिनसे प्रतिदिन करीब 150 अंडों का उत्पादन हो रहा है। इसके अलावा समूह 500 ब्रॉयलर मुर्गियों का भी पालन कर रहा है।
समूह स्थानीय बाजार के साथ-साथ श्रीनगर स्थित एसएसबी को भी नियमित रूप से मुर्गियों की आपूर्ति करता है। प्रत्येक बुधवार को एसएसबी लगभग 80 से 100 किलोग्राम मुर्गियां खरीदती है, जिससे समूह को हर माह करीब 25 से 30 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो रही है।

पैडुल समूह ने छह माह में बढ़ाई आय
ग्राम पैडुल की नैना देवी स्वयं सहायता समूह की तीन महिलाओं ने करीब छह माह पहले ब्रॉयलर पालन शुरू किया। आज उनके पास लगभग 1000 ब्रॉयलर मुर्गियां हैं और प्रतिदिन करीब 150 किलोग्राम मुर्गियों की स्थानीय बाजार में बिक्री की जा रही है। इससे समूह को प्रतिमाह 17 से 20 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है।
सरकारी योजनाओं से मिला आर्थिक सहयोग
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. विशाल शर्मा के अनुसार, ब्रॉयलर फार्म योजना के तहत समूह की तीन महिलाओं को 60 हजार रुपये की सहायता प्रदान की गई है। इसमें 45 हजार रुपये ब्रॉयलर मुर्गियों की खरीद और 15 हजार रुपये मुर्गी बाड़े की मरम्मत के लिए दिए गए हैं।
हिमोत्थान के ब्लॉक मिशन मैनेजर विजय बिष्ट ने बताया कि भैंसवाड़ा में हैचरी मशीन तथा ब्रूडिंग के लिए सोलर प्लांट स्थापित किया गया है। वहीं पैडुल में तीन महिलाओं को 20-20 हजार रुपये का अतिरिक्त सहयोग मिला है। एक दिन के चूजों को तैयार होने में लगभग 32 दिन लगते हैं और प्रत्येक ब्रॉयलर का वजन करीब 2 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।
गांव में ही बन रहे रोजगार के स्थायी अवसर
भैंसवाड़ा और पैडुल की महिलाओं ने स्थानीय संसाधनों, सरकारी योजनाओं और सामूहिक प्रयासों के बल पर गांव में ही रोजगार के स्थायी अवसर विकसित किए हैं। मुर्गी पालन अब उनके परिवारों की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन चुका है।
