देहरादून: उत्तराखण्ड की प्राचीन जल विरासत के संरक्षण की दिशा में स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA) ने जलागम प्रबंधन निदेशालय, देहरादून में “पारंपरिक धारा-नौलों का वैज्ञानिक, वास्तुकलात्मक संरक्षण एवं पुनरुद्धार” विषय पर राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में प्रदेश के सभी 13 जिलों से आए सोशल कॉर्डिनेटर्स एवं कनिष्ठ अभियंताओं ने भाग लिया।
SARRA की एसीईओ कहकशां नसीम ने कहा कि धारा-नौले केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन स्थापत्य कला के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों की भागीदारी से इस संरक्षण अभियान को जन-आंदोलन बनाने पर जोर दिया।
यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने स्प्रिंगशेड प्रबंधन, रिचार्ज ज़ोन के वैज्ञानिक अध्ययन तथा हाइड्रो-जियोलॉजिकल तकनीकों के समन्वय को पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार की आधारशिला बताया।

कार्यशाला में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. नागेंद्र रावत ने ज़ीरो-सीमेंट स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग पर व्याख्यान दिया, जबकि INTACH की विशेषज्ञ अंजलि भरथरी और यूनेस्को सम्मानित संरक्षण वास्तुकार ए. विजया ने पारंपरिक सामग्री परीक्षण, साइट मैपिंग और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मानकों की जानकारी साझा की।
प्रथम चरण में राज्य के 54 ऐतिहासिक एवं पारंपरिक धारा-नौलों के पुनरुद्धार की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। साथ ही जियो-टैगिंग, GIS मैपिंग, डेटा संग्रहण तथा ग्राम पंचायतों के सहयोग से रिचार्ज ज़ोन विकास का प्रशिक्षण भी दिया गया। SARRA की यह पहल उत्तराखण्ड की पारंपरिक जल संस्कृति और आधुनिक भू-जल विज्ञान के समन्वित संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
