October 7, 2026
स्क्रीन पर करीबी, दिल से दूरी: क्या डिजिटल दुनिया हमें भावनात्मक रूप से दूर कर रही है?
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स्क्रीन पर करीबी, दिल से दूरी: क्या डिजिटल दुनिया हमें भावनात्मक रूप से दूर कर रही है?

डॉ विनीता पंत पाण्डेय मनोवैज्ञानिक, रिसर्चर एवं एजुकेटर

कहीं आप भी सुबह उठते ही फोन उठाकर स्क्रॉल करने लगते है और रात को सोने से पूर्व, जब तक फोन मुंह पर न गिर जाए, उसे छोड़ते नहीं?

घबराइये नहीं, आप अकेले नहीं है। आज की दुनिया में अधिकतर लोग इस आदत का शिकार हो चुके है। डिजिटल कनेक्शन इस रोचक आदत का एक अहम कारण है।

आज हम फोन से हजारों लोगो से जुड़े हुए हैं। किसी के जन्मदिन की सूचना हमें मिल जाती है, किसी की नई नौकरी की खबर कुछ सेकंड में दिखाई दे जाती है। हर व्यक्ति की जीवन की अपडेट तुरंत सामने होती है। इसी सुविधा के बीच एक सवाल धीरे-धीरे महत्वपूर्ण होता जा रहा है—क्या हम वास्तव में एक-दूसरे के करीब आए हैं, या केवल एक-दूसरे की स्क्रीन पर मौजूद है?

सोशल मीडिया हमें लगातार दूसरे लोगों की जिंदगी की झलक दिखाता है। अब लोगों को दूसरों को जिंदगी में झांकने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि दूसरे खुद अपनी जिंदगी का हर पल दिखाते है।

इससे उत्पन्न होती है सामाजिक तुलना तथा FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट जैसी परिस्थितियां।
जब हम बार-बार अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना दूसरों की चुनी हुई और मोडिफाइड तस्वीरों से करते हैं, तो हमारे भीतर यह भावना पैदा हो जाती है कि “सब आगे बढ़ रहे हैं और मैं पीछे रह गया हूं” या “सबके पास यह है, मेरे पास नहीं।” इसी तरह फोमो में हम वर्तमान क्षण का आनंद लेने के बजाय यह सोचने लगें कि कहीं हम कुछ miss कर रहे है।

इस प्रभाव की दिलचस्प बात यह भी दिखती है कि कभी-कभी हम किसी कार्यक्रम में मौजूद होकर भी पूरी तरह वहां मौजूद नहीं होते। सामने बैठा व्यक्ति बात कर रहा होता है और हमारा ध्यान फोन पर चला जाता है। परिवार साथ बैठा है, लेकिन हर व्यक्ति अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त है। हम किसी मौके पर माइंडफुली उपस्थित नहीं होते हैं।

शारीरिक रूप से साथ होना और भावनात्मक रूप से उपस्थित होना अलग बात है। हमारे रिश्तों को केवल संवाद की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित करती है।

सोचनीय है, क्या इतने लोगों से जुड़ने के बाद हम सही में किसी से भावनात्मक रूप से जुड़ पा रहे हैं?

एक समय था जब लोग मन और समय लगाकर चिट्ठी लिखा करते थे, फिर बात फोन पर आई और अब सिर्फ फॉरवर्डेड मैसेज भेज कर हमारा संवाद खत्म हो जाता है।

जब हम किसी व्यक्ति से जुड़ना चाहते हो, तो केवल उसका message पढ़ना नहीं, बल्कि उसकी बात सुनना भी जरूरी है। जब परिवार साथ बैठा हो, तो उस समय को फोटो के जरिए केवल स्टेटस में बदलने के बजाय उसे वास्तव में महसूस करना जरूरी है। कभी-कभी बिना फोन के टहलना, किसी दोस्त से मिलकर आमने-सामने बात करना, त्यौहारों पर बाहर उठना-बैठना या कभी बस कुछ समय अपने विचारों के साथ रहना भी मानसिक मौजूदगी के लिए महत्वपूर्ण है।

तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा है और आने वाले समय में इसका महत्व और बढ़ेगा। इसलिए लक्ष्य डिजिटल दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसमें रहते हुए अपनी वास्तविक दुनिया को बचाए रखना है।

आज कनेक्टेड रहना आसान हो गया है, लेकिन अब जरूरत शायद असल रूप से जुड़े रहने की है।

                                                                        डॉ विनीता पंत पाण्डेय
मनोवैज्ञानिक, रिसर्चर एवं एजुकेटर

 

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