अल्मोड़ा। धौलादेवी ब्लॉक प्रमुख लीला पूरन बिष्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकार पर किसानों और ग्रामीण महिलाओं की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार “खेत बचाओ अभियान” के नाम पर बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों की मूल समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस कार्ययोजना दिखाई नहीं दे रही है।
प्रेस को जारी बयान में उन्होंने कहा कि आज किसान खेती की बढ़ती लागत, खाद-बीज की महंगाई, जंगली जानवरों से फसलों को होने वाले नुकसान, सिंचाई सुविधाओं की कमी तथा कृषि उत्पादों का उचित मूल्य न मिलने जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद सरकार इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने में विफल साबित हुई है।
लीला पूरन बिष्ट ने कहा कि सरकार वर्षों तक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देती रही और अब उनके दुष्प्रभावों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में किसानों की आय बढ़ाने और मृदा संरक्षण को लेकर गंभीर है तो जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज, प्रशिक्षण, मजबूत विपणन व्यवस्था और उत्पादों के समर्थन मूल्य की गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए।
उन्होंने स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि सरकार महिलाओं को केवल कार्यक्रमों और रैलियों में भीड़ जुटाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रही है, जबकि उनके उत्पादों के विपणन, स्वरोजगार, लघु उद्योगों के विकास और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए कोई स्थायी एवं प्रभावी योजना लागू नहीं की जा रही है।
ब्लॉक प्रमुख ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं, गांव लगातार खाली हो रहे हैं और युवाओं का पलायन बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में केवल प्रचारात्मक कार्यक्रम आयोजित कर सरकार किसानों और ग्रामीण महिलाओं के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने मांग की कि सरकार आंगनबाड़ी कार्यकर्तियों, आशा कार्यकर्तियों, किसानों तथा स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के लिए ठोस आर्थिक योजनाएं लागू करे। साथ ही उनके उत्पादों की खरीद और विपणन की गारंटी सुनिश्चित करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए गंभीर और प्रभावी पहल करे।
लीला पूरन बिष्ट ने कहा कि केवल प्रचार और भीड़ जुटाने से किसानों और महिलाओं का कल्याण नहीं होने वाला है, बल्कि उनके जीवन और आजीविका से जुड़े मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
