हल्द्वानी। एमबी इंटर कॉलेज ग्राउंड, कैनाल रोड में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात-दिवसीय भगवान शिव कथा के दूसरे दिन आध्यात्मिक वातावरण चरम पर रहा। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य डॉ. सर्वेश्वर जी ने समुद्र मंथन प्रसंग के माध्यम से मानव जीवन के गहरे सत्य को उजागर किया।
उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन के दौरान निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने जगत की रक्षा के लिए स्वयं ग्रहण किया। यह घटना हमें सिखाती है कि समाज के कल्याण के लिए कभी-कभी स्वयं कष्ट सहना पड़ता है। यही महादेव का नीलकंठ स्वरूप है — त्याग और सहनशीलता का प्रतीक।
डॉ. सर्वेश्वर जी ने कहा कि आज का मानव ‘मैं’ में उलझा हुआ है और दूसरों को नुकसान पहुँचाने से भी नहीं हिचकिचाता। पशु-पक्षियों पर हो रही हिंसा पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि जब शिव स्वयं पशुपतिनाथ हैं, तब पशु-हत्या कर स्वयं को उनका भक्त कहना आत्मविरोध है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि सच्चा शिव भक्त वही है जो परपीड़ा को समझे, स्वार्थ त्यागे और सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखे।
उनके शब्दों में —
“आश्वासन सबसे बड़ा आसन है, सहयोग सबसे श्रेष्ठ योग है और विश्वास सबसे लंबी श्वास।”
कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया और जीवन में करुणा व प्रेम को अपनाने का संकल्प लिया।

